रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास के अंतर्गत चातुर्मासिक प्रवचनमाला में शनिवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने कहा कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए सबसे पहले अनुकूलता के प्रति राग और प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति द्वेष का त्याग करना आवश्यक है। सद्ज्ञान को अपनाकर और दुर्ज्ञान का परित्याग कर ही जीव मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि मोक्ष मार्ग का प्रथम सोपान सम्यक दर्शन है। यदि मन दुर्ज्ञान में डूबा रहेगा तो जीव मोक्ष मार्ग से विमुख हो जाएगा, जबकि सद्ज्ञान सद्गति की ओर ले जाता है और दुर्ज्ञान दुर्गति का कारण बनता है।
उन्होंने कहा कि चिंतन से भावना, भावना से ध्यान और ध्यान से आत्मानुभूति का भाव उत्पन्न होता है। यही उत्तम भाव मनुष्य को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इसलिए सद्ज्ञान और दुर्ज्ञान के अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि गुरु भगवंत के सान्निध्य में आकर यदि व्यक्ति आवश्यक धार्मिक विधियों का पालन करता है तो उसकी आत्मा का उत्थान होता है। विरक्त व्यक्ति के लिए संसार तिनके के समान हो जाता है, जबकि आसक्ति से ग्रस्त व्यक्ति को यही संसार बोझ प्रतीत होता है। जब तक वैराग्य नहीं आता, तब तक प्रभु के वचनों का वास्तविक मर्म भी समझ में नहीं आता।
मुनिश्री ने कहा कि शुभ ज्ञान और धर्म ध्यान का अनुसरण करने वाला जीव सद्गति प्राप्त करता है। केवल ध्यान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि ध्यान किस दिशा में है। यदि विवेक जागृत नहीं होगा तो जीव अशुभ ज्ञान और अधोगति की ओर बढ़ जाएगा।
मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक जीव मोक्ष चाहता है, लेकिन बिना अध्यात्म, ध्यान-साधना और आत्मचिंतन के मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। मोक्ष अध्यात्म जगत की सर्वोच्च मंजिल है और इस मार्ग पर चले बिना मुक्ति नहीं मिल सकती।
मुनिश्री ने कहा कि कषायों से घिरा हुआ जीव मोक्ष मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता। जप, तप, संयम और स्वाध्याय को जीवन में अपनाकर ही आत्मशुद्धि और मोक्ष की दिशा में सार्थक पुरुषार्थ किया जा सकता है।
49 दिन सिर्फ गर्म पानी दिन में केवल दो से तीन बार ग्रहण करेंगे तपस्वी
प्रचार प्रसार मंत्री चंद्रप्रकाश ललवानी और कल्प तरुण कोचर ने बताया कि तप के क्रम में श्राविका मधु कोठारी का 1 अगस्त को दूसरा उपवास रहा। वहीं 2 अगस्त से पंच परमेष्ठी श्रेणी तप प्रारंभ होगा, जो 19 सितंबर तक चलेगा। इस तप का पारणा 20 सितंबर को गुरु भगवंतों के सानिध्य में होगा। इस 49 दिवसीय महातप में तपस्वी पहले क्रम में एक उपवास फिर व्यासना, एक उपवास फिर व्यासना, दो उपवास फिर व्यासना करेंगे। दूसरे क्रम में एक उपवास फिर व्यासना, दो उपवास फिर व्यासना,तीन उपवास फिर व्यासना करेंगे। तीसरे क्रम में एक उपवास फिर व्यासना, दो उपवास फिर व्यासना,तीन उपवास फिर व्यासना, चार उपवास फिर व्यासना करेंगे। चौथे क्रम में एक उपावास फिर व्यासना,दो उपवास फिर व्यासना,तीन उपवास फिर व्यासना,चार उपवास फिर व्यासना,पांच उपवास फिर व्यासना तपस्वी करेंगे। तपस्वी उपवास के दिन में सिर्फ गर्म पानी दो या तीन बार ग्रहण करेंगे। तपस्वी व्यासना के दिन सूर्य उदय के बाद एवं सूर्य अस्त से 48 मिनट पहले ही अन्न ग्रहण करेंगे। व्यासना में तपस्वी सुबह 10:30 बजे व शाम 4:30 बजे केवल 1 घंटे के अंदर अन्न ग्रहण करेंगे।
अनुकूलता का राग और प्रतिकूलता का द्वेष छोड़ें : मुनि संवेगरत्न सागर



















