छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

बिलासपुर/रायपुर, 24 जून। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नियमित सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ दैनिक वेतनभोगी, मस्टर रोल, संविदा कर्मचारी और कॉलेजों में कार्यरत अतिथि व्याख्याता भी पूरी तरह से मातृत्व अवकाश और सवेतन लाभ के हकदार हैं।

उच्च न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि मातृत्व लाभ कोई दया या कृपा नहीं, बल्कि एक मानवीय और वैधानिक अधिकार है। नियुक्ति के स्वरूप (अस्थायी या संविदा) के आधार पर किसी भी महिला कर्मचारी के साथ इस अधिकार को लेकर भेदभाव नहीं किया जा सकता।

यह फैसला उच्च न्यायालय की एकल पीठ द्वारा सुनाया गया है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में मातृत्व अधिकारों और महिला हितों से जुड़े हालिया मामलों की सुनवाई मुख्य रूप से जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ द्वारा की जा रही है।

रायपुर की रहने वाली शिल्पी शुक्ला नवंबर, 2022 से शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ कॉलेज में अतिथि व्याख्याता के रूप में कार्यरत हैं। गर्भावस्था के दौरान उनका 13 सितंबर, 2025 से मातृत्व अवकाश कॉलेज प्रबंधन ने स्वीकृत किया था और वे 20 मार्च, 2026 को ड्यूटी पर लौट आईं। बाद में उन्होंने अवकाश अवधि के वेतन के लिए आवेदन किया, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग ने उन्हें अतिथि कर्मचारी बताते हुए लाभ देने से इंकार कर दिया। जिसके बाद इस विषय को लेकर शिल्पी शुक्ला ने अप्रैल-मई, 2026 के दौरान छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से कहा गया कि वे नियमित कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए वित्तीय लाभ की पात्र नहीं हैं। जिसपर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मातृत्व लाभ एक मानवीय और वैधानिक अधिकार है, केवल नियुक्ति के स्वरूप के आधार पर महिला कर्मचारी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि वह नियमित व्याख्याता की तरह सभी शैक्षणिक दायित्व निभा रहीं थीं। केवल ‘अतिथि’ होने के आधार पर मातृत्व अवकाश का वेतन रोकना गैरकानूनी और अमानवीय है।

बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय ने उच्च शिक्षा विभाग को तीन माह के अंदर मातृत्व अवकाश अवधि का पूरा बकाया वेतन भुगतान करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि मातृत्व लाभ कोई दया या कृपा नहीं, बल्कि एक मानवीय और वैधानिक अधिकार है। नियुक्ति के स्वरूप (अस्थायी या संविदा) के आधार पर किसी भी महिला कर्मचारी के साथ इस अधिकार को लेकर भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने रेखांकित किया कि महिला कर्मचारियों का वेतन सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि वे संविदा या अतिथि पद पर हैं।

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