भोपाल, 11 सितंबर । मध्य प्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य और खान-पान को लेकर बड़ा नीतिगत हस्तक्षेप सामने आया है। बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित खाद्य वातावरण को लेकर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्कूलों और महाविद्यालयों के परिसरों के साथ-साथ उनके आसपास बिकने वाले अत्यधिक वसा, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों यानी हाई फैट, शुगर एंड साल्ट (एचएफएसएस) पर नियंत्रण की पहल की है। आयोग ने शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को पत्र भेजकर शैक्षणिक संस्थानों के परिसर और उनके 50 मीटर के दायरे को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।
संसद के कानून से मिले अधिकारों के तहत उठाया मुद्दा
आयोग ने सरकार का ध्यान इस तथ्य की ओर भी दिलाया है कि वह संसद द्वारा अधिनियमित ‘बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005’ के तहत गठित वैधानिक आयोग है। अधिनियम की धारा 17 में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के गठन का प्रावधान है, जबकि धारा 24 के तहत धारा 13(1), 14 और 15 के प्रावधान राज्य आयोग पर भी लागू होते हैं। धारा 13 आयोग को बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करने, उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उपाय सुझाने तथा बच्चों के अधिकार और कल्याण से जुड़े विषय संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष उठाने का अधिकार देती है।
स्कूल में स्वस्थ भोजन की शिक्षा, बाहर जंक फूड की उपलब्धता क्यों?
आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा का कहना है, “बच्चों की खान-पान की आदतों और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले ऐसे खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता को रोकना बाल हित और स्वस्थ विकास की दृष्टि से जरूरी है। विद्यालय स्तर पर खान-पान की आदतों में सुधार भविष्य में मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य जीवनशैली संबंधी स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।”
आयोग ने अपने पत्र में बच्चों के खान-पान की बदलती आदतों को गंभीर चिंता का विषय बताया है। पैकेटबंद और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, अधिक चीनी वाले पेय, तले हुए खाद्य पदार्थ, मीठे स्नैक्स तथा अधिक नमक और वसा वाले खाद्य पदार्थ बच्चों के दैनिक भोजन में बढ़ती उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
आयोग का तर्क है कि बचपन में विकसित खान-पान की आदतें आगे चलकर व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवनशैली को प्रभावित करती हैं। ऐसे में स्कूल सिर्फ शिक्षा देने का स्थान नहीं, बल्कि बच्चे के व्यवहार, अनुशासन और जीवनशैली निर्माण का महत्वपूर्ण संस्थान है, इसलिए विद्यालय में स्वस्थ भोजन की शिक्षा और स्कूल के बाहर अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की सहज उपलब्धता के बीच का विरोधाभास समाप्त करना जरूरी है।
50 मीटर में सिर्फ बिक्री नहीं, विज्ञापन पर भी रोक
आयोग की सिफारिश का दायरा सिर्फ कैंटीन तक सीमित न रहते हुए स्कूल-कॉलेज परिसर और उसके 50 मीटर के दायरे में एचएफएसएस खाद्य पदार्थों की बिक्री के साथ विज्ञापन, प्रचार, ब्रांडिंग और बच्चों को लक्षित विपणन को नियंत्रित करने की प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की बात कही गई है। स्थानीय निकाय, जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग के माध्यम से आसपास के खाद्य विक्रेताओं की नियमित निगरानी और अनुपालन व्यवस्था बनाने का भी सुझाव है।
कैंटीन में पौष्टिक भोजन की तय हो सूची
आयोग ने विद्यालयों और महाविद्यालयों की कैंटीन, कैफेटेरिया, छात्रावास तथा परिसर के भीतर संचालित खाद्य केंद्रों के लिए स्वस्थ और पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों की सूची तथा मानक निर्धारित करने की अनुशंसा की है। साथ ही बच्चों को स्थानीय और पारंपरिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों से जोड़ने के लिए ‘स्वस्थ भोजन–स्वस्थ बचपन’ जैसे अभियान चलाने का सुझाव दिया गया है। आयोग का जोर बच्चों को संतुलित आहार, पोषण, खाद्य सुरक्षा, स्वस्थ जीवनशैली और शारीरिक सक्रियता के संबंध में आयु-उपयुक्त जागरूकता देने पर भी है।
कुपोषण के साथ बदलती जीवनशैली की चुनौती
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में बाल पोषण की चुनौती दोहरे स्वरूप की है। एक ओर कई क्षेत्रों में कुपोषण और पोषण की कमी चिंता का विषय है, वहीं शहरी क्षेत्रों में बदलती जीवनशैली, शारीरिक निष्क्रियता और असंतुलित खान-पान से जुड़ी समस्याएं सामने आ रही हैं। आयोग का मानना है कि राज्य की बाल पोषण नीति का लक्ष्य बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने के अलावा उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ, पौष्टिक और संतुलित खाद्य वातावरण देना भी होना चाहिए।
छह विभाग मिलकर बनाएंगे कार्ययोजना
आयोग ने इस विषय को किसी एक विभाग तक सीमित रखने के बजाय स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, खाद्य सुरक्षा, नगरीय प्रशासन तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभागों के समन्वय से अंतर-विभागीय कार्ययोजना तैयार करने की सिफारिश की है। जिला स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर समयबद्ध निगरानी व्यवस्था विकसित करने का भी सुझाव दिया गया है।
छोटे विक्रेताओं की आजीविका भी ध्यान में
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य छोटे खाद्य विक्रेताओं या किसी खाद्य व्यवसाय की आजीविका को अनावश्यक रूप से प्रभावित करना नहीं है। आवश्यकता होने पर चरणबद्ध क्रियान्वयन, संक्रमण अवधि और अनुमन्य पौष्टिक खाद्य विकल्पों को बढ़ावा देने की व्यवस्था की जा सकती है। यानी लक्ष्य कारोबार बंद करना न होकर बच्चों के आसपास के खाद्य वातावरण में व्यवहार परिवर्तन लाना है।
‘इलाज से पहले बचाव’ पर आयोग का जोर
आयोग ने स्कूली शिक्षामंत्री से आग्रह किया है कि बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में ‘इलाज से पहले बचाव’ की नीति को प्राथमिकता दी जाए। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की ‘ईट राइट स्कूल’ जैसी पहलों के अनुरूप मप्र में भी प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई है।
मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की यह सिफारिश फिलहाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार बच्चों के खान-पान के सवाल को सिर्फ खाद्य सुरक्षा नहीं, बाल अधिकार, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षित विकास के समग्र मुद्दे के रूप में सामने रखा गया है। यदि सरकार इस पर नीति या दिशा-निर्देश जारी करती है तो स्कूलों के आसपास के खाद्य बाजार का स्वरूप बदलने के साथ प्रदेश में बच्चों के लिए स्वस्थ खाद्य वातावरण तैयार करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

















