दुर्ध्यान से सद्ज्ञान की ओर बढ़ने का लक्ष्य बनाएं : मुनि संवेगरत्न सागर

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दुर्ध्यान से सद्ज्ञान की ओर बढ़ने का लक्ष्य बनाएं : मुनि संवेगरत्न सागर

रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में सर्वमंगलमय वर्षावास की चातुर्मासिक प्रवचनमाला में मुनिसंवेगरत्न सागर ने कहा कि मनुष्य का ध्यान उसके मन के माध्यम से होता है। यदि मन अशुभ भावों से ग्रसित हो जाए तो वह दुर्ध्यान और अज्ञान की ओर बढ़ता है, जबकि सद्ज्ञान आत्मा को सुख, शांति और कल्याण के मार्ग पर ले जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य दुर्ध्यान से निकलकर सद्ज्ञान की ओर बढ़ना होना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि अज्ञान ही मनुष्य को दुर्ध्यान में बांधे रखता है। इससे बचने के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। यदि सद्ज्ञान प्राप्त करना है तो सबसे पहले संसार के मोह और आसक्ति का परित्याग करना होगा। संसार का त्याग ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। ज्ञान और ध्यान के माध्यम से आत्मा को निर्मल बनाने का सतत प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सत्य को जान लेने के बाद भी उसे जीवन में अपनाने से जो शक्ति रोकती है, वही अज्ञान ध्यान है। यही अज्ञान मनुष्य को दुख, पीड़ा और दुर्गति की ओर ले जाता है। अविनयपूर्ण आचरण करना और गलत विचारों में उलझे रहना भी अज्ञान ध्यान है। ज्ञान व्यक्ति के दर्शन को निर्मल बनाता है और जीवन में श्रेष्ठ चारित्र्य का निर्माण करता है। इसलिए सभी को अपने भीतर के नकारात्मक विचारों का त्याग करने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि ज्ञान में भले ही कोई व्यक्ति आगे बढ़ जाए, लेकिन जिससे ज्ञान मिला है, उसका सम्मान और भक्ति सर्वोपरि होनी चाहिए। ग्रंथ जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार करना चाहिए तथा प्रभु के वचनों का अनुसरण करना चाहिए। केवल जिनवाणी का श्रवण कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे तत्काल अपने जीवन में उतारना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि आत्मा के कल्याण के लिए केवल दृष्टिकोण और लक्ष्य बदलने की आवश्यकता है। जिस समर्पण से मनुष्य शरीर के लिए कार्य करता है, उसी भावना से आत्मा के लिए भी प्रयास करना चाहिए। श्रावक जीवन का प्रथम कर्तव्य ज्ञान की पूजा, उसका सम्मान और भक्ति है। अज्ञान ध्यान की परंपरा अनेक भवों को बिगाड़ देती है, इसलिए सद्ज्ञान को अपनाकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।

चातुर्मास में तप की श्रृंखला जारी
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुणीया व महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि सर्व मंगलमय वर्षावास में तप की श्रृंखला जारी है। श्रावक और श्राविकाएं तप से आत्मकल्याण की ओर अग्रसर हो रहे हैं। 49 दिवसीय पंच परमेष्ठी श्रेणी तप का दूसरा चरण चल रहा है। बुधवार को सभी तपस्वियों का व्यासना रहा। तपस्या की कड़ी में श्रावक संयम बैद का 9 उपवास और श्राविका पूजा सुराना का 9 उपवास रहा। धर्मसभा में सभी ने तप की खूब अनुमोदना की। तपस्वियों का सम्मान किया गया।

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