मणिपुर की इम्फाल घाटी में चिरांग नदी के किनारे वैज्ञानिकों को एक अद्भुत चीज मिली है – 37000 साल पुराना बांस का तना. इस पर पुराने कांटों के निशान बिल्कुल साफ दिख रहे हैं. यह एशिया में अब तक मिला सबसे पुराना कांटेदार बांस का जीवाश्म है. खास बातें यह बांस हिमयुग (Ice Age) का है – जब धरती पर बहुत ठंड थी. उस समय यूरोप और दुनिया के कई हिस्सों से बांस पूरी तरह खत्म हो गए थे, लेकिन मणिपुर-उत्तर-पूर्व भारत में बांस बचे रहे.
कारण? यहां का मौसम गर्म और नम था, बांस को सुरक्षित जगह (रिफ्यूज) मिली. कांटे इसलिए थे ताकि जानवर बांस को खा न सकें – यह सुरक्षा का पुराना तरीका 37000 साल पहले भी था. बांस का जीवाश्म मिलना बहुत मुश्किल होता है बांस खोखले और नरम होते हैं, जल्दी सड़ जाते हैं. पत्थर बनकर बचते ही नहीं. इसलिए दुनिया में बांस के जीवाश्म बहुत कम मिलते हैं. इस बार जो मिला, उस पर गांठें, कलियां और कांटों के निशान भी साफ हैं. यह अपने आप में चमत्कार है.
कौन से वैज्ञानिकों ने खोजा? लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज (BSIP) के वैज्ञानिकों की टीम – हिमानी भाटिया, प्रियंका कुमारी, एन. हाओबिजम सिंह और जी. श्रीवास्तव. ये लोग नदी की पुरानी मिट्टी खोज रहे थे, तभी यह बांस का टुकड़ा मिल गया. लैब में जांच करने पर पता चला कि यह चिमोनोबैम्बूसा प्रजाति का है. आज के कांटेदार बांस जैसे बंबूसा बैंबोस और चिमोनोबैम्बूसा कैलोसा से बहुत मिलता-जुलता है. इसका मतलब क्या है?
उत्तर-पूर्व भारत हिमयुग में भी हरा-भरा जंगल वाला इलाका था. जब पूरी दुनिया ठंडी और सूखी हो गई थी, तब भी मणिपुर में बांस फल-फूल रहे थे. यह इलाका बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट था – यानी पेड़-पौधों और जानवरों की सुरक्षित पनाहगाह. अब पता चल गया कि कांटेदार बांस एशिया में कम से कम 37000 साल से हैं. यह खोज कहां छपी? दुनिया की मशहूर जर्नल Review of Palaeobotany and Palynology में प्रकाशित हुई है. एक छोटा-सा बांस का टुकड़ा हमें बता रहा है कि लाखों साल पहले मणिपुर की धरती कितनी खास थी. जब बाकी दुनिया बर्फ से ढक गई थी, तब भी यहां हरे-भरे जंगल लहलहा रहे थे. मणिपुर ने हिमयुग में भी बांस को बचाया – और आज उसकी गवाही दे रहा है 37000 साल पुराना यह कांटेदार बांस.














