शिमला, 02 मई । पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने हिमाचल प्रदेश की युवा पीढ़ी से जुड़े एक महत्वपूर्ण सर्वे के परिणामों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह सर्वे न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि प्रदेश के भविष्य को लेकर गंभीर संकेत भी देता है।
उन्होंने बताया कि पीजीआई चंदिया और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अध्ययन के अनुसार हिमाचल प्रदेश के लगभग 11 हजार किशोरों पर किए गए सर्वे में 53 प्रतिशत किशोर मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। इनमें से 14 प्रतिशत अवसाद (डिप्रेशन) के शिकार हैं, जबकि 5 प्रतिशत किशोरों में आत्महत्या के विचार पाए गए। विशेष रूप से 15 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोर अधिक प्रभावित पाए गए हैं।
शांता कुमार ने शनिवार को एक बयान में कहा कि युवाओं में बढ़ते मानसिक तनाव के प्रमुख कारणों में करियर को लेकर चिंता, बढ़ती बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता शामिल हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के अधिकांश किशोर किसी न किसी प्रकार के मानसिक दबाव में जीवन जी रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।
उन्होंने यह भी कहा कि हिमाचल प्रदेश को देश के संपन्न राज्यों में गिना जाता है, लेकिन इसके बावजूद यहां की युवा पीढ़ी मानसिक तनाव से जूझ रही है, जो सामाजिक और आर्थिक असमानता की ओर संकेत करता है। उन्होंने देश में विकास के प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि योजनाओं के बावजूद आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है।
शांता कुमार के अनुसार युवाओं में मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी है। उन्होंने कहा कि यदि एक छोटे राज्य में ही इतनी बड़ी संख्या में किशोर मानसिक तनाव और आत्महत्या के विचारों से प्रभावित हैं, तो यह भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
उन्होंने सरकार और समाज से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया। साथ ही सुझाव दिया कि युवाओं को मानसिक रूप से सशक्त बनाने के लिए योग और नैतिक शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि संपन्न माने जाने वाले हिमाचल प्रदेश की यह स्थिति है, तो देश के अन्य राज्यों की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। इसलिए इस मुद्दे पर तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
















