इंसान चलना कैसे सीखे, यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बना हुआ था। अब, साइंस एडवांसेज नाम के साइंटिफिक जर्नल में पब्लिश एक नई स्टडी ने इसका जवाब बता दिया है। रिसर्च के मुताबिक, साहेलेंथ्रोपस चाडेंसिस नाम का एक जीव, जो लगभग 70 लाख साल पहले अफ्रीका में रहता था, उसमें दो पैरों पर चलने की क्षमता थी। आइए आपको इसके बारे में और बताते हैं। रेगिस्तान में मिली एक अहम कड़ी इस प्रजाति के जीवाश्म सबसे पहले 2001 में अफ्रीका के देश चाड के रेगिस्तानी इलाके में मिले थे। तब से इस बात पर बहस चल रही थी कि क्या यह जीव बंदरों की तरह चलता था या इंसानों की तरह सीधा खड़ा होता था। अब, नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके की गई जांच ने इस बहस को काफी हद तक खत्म कर दिया है।
हड्डियों ने बताया चलने का राज न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के डॉ. स्कॉट विलियम्स के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस जीव की जांघ और हाथ की हड्डियों का बारीकी से अध्ययन किया। 3D मॉडल का इस्तेमाल करके हड्डियों की अंदरूनी बनावट की जांच की गई। जांच में पता चला कि जांघ की हड्डी पर ऐसे निशान हैं जो सिर्फ सीधे चलने वाले जीवों में पाए जाते हैं। कूल्हों और घुटनों की बनावट शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करती थी।
यह जीव पूरी तरह से ज़मीन पर रहने वाला नहीं था। इसके हाथों की हड्डियां बताती हैं कि यह पेड़ पर चढ़ने, डालियों से लटकने और उनमें घूमने में भी सक्षम था। यह जीव पेड़ों और ज़मीन दोनों पर आराम से रह सकता था। इंसानियत का रास्ता धीरे-धीरे तय हुआ वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसानों में दो पैरों पर चलना कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं था। यह एक लंबी और धीमी प्रक्रिया थी। सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह बदलाव दिमाग के बड़ा होने से पहले शुरू हुआ था। यह खोज हमें इंसान के विकास की कहानी को एक नए नज़रिए से देखने में मदद करती है। यह यह भी दिखाता है कि हमारे सबसे पुराने पूर्वज, जो आधुनिक चिंपैंजी जैसे दिखते थे, उन्होंने पहले ही इंसान बनने के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया था।











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