कर्तव्य से आगे बढ़कर योगदान: 77वें गणतंत्र दिवस पर आइस हॉकी में बदलाव की कहानी लिख रहे हैं लद्दाख स्काउट्स


खेल 26 January 2026
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कर्तव्य से आगे बढ़कर योगदान: 77वें गणतंत्र दिवस पर आइस हॉकी में बदलाव की कहानी लिख रहे हैं लद्दाख स्काउट्स

लेह (लद्दाख), 26 जनवरी। देश में आइस हॉकी की एक नई क्रांति आकार ले रही है और इसके केंद्र में हैं भारतीय सेना की विशेष पर्वतीय पैदल सेना रेजिमेंट — लद्दाख स्काउट्स। जब पूरा देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, ऐसे समय में आइस हॉकी के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को उजागर करने से बेहतर मौका नहीं हो सकता।

2026 खेलो इंडिया विंटर गेम्स (केआईडब्ल्यूजी) के छठे संस्करण का पहला चरण लेह (लद्दाख) में जारी है, जहां आइस हॉकी और आइस स्केटिंग के रोमांचक मुकाबले देखने को मिल रहे हैं। एक बार फिर लद्दाख स्काउट्स की टीम “आर्मी” के नाम से प्रतियोगिता में दबदबा बनाए हुए है। गणतंत्र दिवस के मौके पर सोमवार को पुरुष वर्ग के फाइनल में आर्मी का सामना चंडीगढ़ से होगा, जो इस संस्करण की चौंकाने वाली टीम रही है।

हालांकि, लद्दाख स्काउट्स की असली उपलब्धि केवल पदकों या जीत तक सीमित नहीं है। उनका सबसे बड़ा योगदान आइस हॉकी को भारत में लोकप्रिय बनाने की दिशा में है — इसे केवल बर्फीले और पहाड़ी इलाकों तक सीमित न रखकर मैदानों और तटीय क्षेत्रों तक ले जाने का उनका सपना कहीं ज्यादा मायने रखता है।

कहा जाता है कि लद्दाख स्काउट्स ने 1970 के दशक के अंत में आइस हॉकी खेलना शुरू किया था। तब न तो ढंग के मैदान थे और न ही उपकरण — खेल सिर्फ मनोरंजन के लिए खेला जाता था। 1980 के दशक के अंत में उन्होंने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया, प्राकृतिक आइस रिंक बनाए गए और महंगे उपकरण मंगवाए गए। आज एक खिलाड़ी के आइस हॉकी किट की कीमत करीब 4 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। वर्ष 2000 में पूर्ण पैदल सेना रेजिमेंट बनने के बाद खेल को लेकर उनकी प्रतिबद्धता और मजबूत हुई।

वर्तमान में भारत में सिर्फ दो ओलंपिक आकार के कृत्रिम आइस रिंक हैं — एक देहरादून में और दूसरा लेह में स्थित इनडोर नवांग दोरजे स्तोबदान स्टेडियम में। 2026 केआईडब्ल्यूजी में भाग ले रहे आर्मी टीम के सदस्य कैप्टन पार्थ जगताप का मानना है कि आइस हॉकी को लोकप्रिय बनाने के लिए देशभर में ऐसे रिंक बनना जरूरी है।

कैप्टन जगताप ने साई मीडिया के हवाले से कहा,“अगर आइस हॉकी को सच में जन-जन का खेल बनाना है, तो देश के अलग-अलग हिस्सों में आइस रिंक बनाने होंगे। फिलहाल यह खेल काफी हद तक लेह तक सीमित है। इसे देश के अन्य कोनों तक ले जाना ही इसके विकास का रास्ता है।”

पिछले साल मुंबई में खेल और शिक्षा में उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित कैप्टन जगताप ने खेलो इंडिया की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि खेलो इंडिया की वजह से आइस हॉकी को मीडिया कवरेज मिला है और लोगों में इस खेल को लेकर जागरूकता बढ़ी है।

आइस रिंक का निर्माण बेहद महंगा होता है। एक साधारण रिंक पर करीब 15 करोड़ रुपये, जबकि 5,000 दर्शकों की क्षमता वाले इनडोर स्टेडियम पर 40–50 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। ऐसे में कॉरपोरेट सहयोग बेहद अहम हो जाता है। यदि रिलायंस, अडानी या टाटा जैसे बड़े उद्योग समूह आगे आते हैं, तो भारत में आइस हॉकी का परिदृश्य तेजी से बदल सकता है और यह खेल लेह से बाहर भी फैल सकता है।

लद्दाख स्काउट्स ने इस दिशा में कॉरपोरेट भागीदारी का विचार भी सामने रखा है। सैनिकों का मुख्य कर्तव्य सीमाओं की रक्षा करना है, लेकिन कई बार वे उससे आगे बढ़कर समाज की जिम्मेदारी भी निभाते हैं — और यही है कर्तव्य से आगे बढ़कर योगदान।

इसका एक बेहतरीन उदाहरण पिछले साल देखने को मिला, जब लद्दाख स्काउट्स ने अंतिम समय में भारतीय महिला राष्ट्रीय आइस हॉकी टीम की आर्थिक मदद की। इसका नतीजा यह रहा कि भारत ने यूएई में आयोजित आईआईएचएफ महिला एशिया कप में अपना पहला कांस्य पदक जीता।

‘स्नो लेपर्ड्स’ या ‘स्नो वॉरियर्स’ के नाम से मशहूर लद्दाख स्काउट्स अब केवल मैदान पर नहीं, बल्कि देश में आइस हॉकी के भविष्य को संवारने के मिशन पर हैं। उन्हें पूरा भरोसा है कि उनकी कोशिशें जल्द ही भारत को वैश्विक आइस हॉकी मंच पर एक पहचान दिलाएंगी।

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