अब तक यह माना जाता था कि डायनासोर ठंडे इलाकों से बचते थे और सर्दियों में गर्म इलाकों में चले जाते थे। हालांकि, अलास्का में एक नई खोज ने इस सोच को बदल दिया है। वैज्ञानिकों को आर्कटिक के पर्माफ्रॉस्ट में बहुत छोटे डायनासोर के जीवाश्म मिले हैं। ये जीवाश्म सिर्फ 1 से 2 मिलीमीटर के हैं और इनमें छोटे दांत और हड्डी के टुकड़े शामिल हैं। सात अलग-अलग डायनासोर के जीवाश्म यह खोज अलास्का के नॉर्थ स्लोप इलाके में प्रिंस क्रीक फॉर्मेशन में की गई थी। यह इलाका आज भी काफी ठंडा और कठोर माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये जीवाश्म कम से कम सात अलग-अलग तरह के डायनासोर के हैं। इनमें शाकाहारी बत्तख की चोंच वाले हैड्रोसॉर और खतरनाक मांसाहारी टायरानोसॉर शामिल हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये जीवाश्म वयस्क डायनासोर के नहीं, बल्कि अंडों के अंदर के भ्रूण या नए जन्मे बच्चों के हैं। यह साफ दिखाता है कि डायनासोर आर्कटिक में अंडे देते थे और अपने बच्चों को जन्म देते थे। इसका मतलब यह भी है कि वे हर साल गर्म इलाकों में नहीं जाते थे, बल्कि पूरे साल वहीं रहते थे।यह रिसर्च साइंस जर्नल करंट बायोलॉजी में पब्लिश हुई है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि प्रिंस क्रीक फॉर्मेशन में मिले डायनासोर के लगभग 70 प्रतिशत जीवाश्म छोटे बच्चों के हैं। इससे यह साफ होता है कि ये डायनासोर वहां की ठंडी और अंधेरी सर्दियों को सहते थे।
ठंडे माहौल में जीवित रहने की क्षमता वैज्ञानिकों का मानना है कि लेट क्रेटेशियस काल के दौरान आर्कटिक में औसत तापमान लगभग 6 डिग्री सेल्सियस था, जो आज के ओटावा के तापमान जैसा ही है। इसके बावजूद, वहां लंबी, ठंडी रातें और सीमित धूप होती थी। ऐसे माहौल में जीवित रहने के लिए, डायनासोर में अपने शरीर की गर्मी बनाए रखने की खास क्षमता रही होगी। अंडों को सेने में 5-6 महीने लगते थे इस रिसर्च में शामिल वैज्ञानिकों में से एक प्रोफेसर ग्रेगरी एरिक्सन ने कहा कि डायनासोर के अंडों को वहां सेने में लगभग 5 से 6 महीने लगते होंगे। इसलिए, जैसे ही सर्दियां शुरू होतीं, छोटे डायनासोर बाहर निकलते। इतनी कम उम्र में हजारों किलोमीटर की यात्रा करना संभव नहीं था। इसलिए, वहीं रहना और ठंड को सहना शायद उनके लिए सबसे अच्छा विकल्प था। डायनासोर हमारी सोच से कहीं ज़्यादा लचीले और बुद्धिमान थे।











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