मिजोरम का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय बना देश का 21वां नामित रिपॉजिटरी


देश 07 July 2026
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मिजोरम का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय बना देश का 21वां नामित रिपॉजिटरी

नई दिल्ली, 07 जुलाई । पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल स्थित प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय को जैव विविधता अधिनियम के तहत डिजाइनेटेड रिपॉजिटरी यानी नामित भंडारगृह के रूप में अधिसूचित किया है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार ने यह अधिसूचना जारी की। इसके साथ ही यह देश का 21वां नामित रिपॉजिटरी बन गया ।

नामित रिपॉजिटरी ऐसे संस्थान होते हैं, जहां जैव विविधता अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त प्रमाणित जैविक नमूनों का वैज्ञानिक ढंग से संरक्षण किया जाता है। इन संग्रहों का उपयोग नई प्रजातियों की पहचान, वैज्ञानिक अनुसंधान, जैव संसाधनों के दस्तावेजीकरण तथा दीर्घकालिक संरक्षण में किया जाता है।

मिजोरम विश्वविद्यालय का यह संग्रहालय प्टेरिडोफाइट्स, मैक्रोफंगी, सरीसृप, उभयचर, मछलियां, पतंगे, बीटल और तितलियों सहित विभिन्न वनस्पति एवं जीव-जंतुओं के वाउचर स्पेसिमेन सुरक्षित रखेगा।

साथ ही, क्षेत्र में खोजी जाने वाली नई प्रजातियों के टाइप स्पेसिमेन का भी आधिकारिक भंडार होगा। इससे प्रजातियों की पहचान और वैज्ञानिक प्रमाणिकता को मजबूती मिलेगी तथा भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं, आवास विनाश या प्रजातियों में गिरावट की स्थिति में पारिस्थितिक पुनर्स्थापन में सहायता मिलेगी। वर्ष 2022 में स्थापित यह संग्रहालय इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्थित है, जो विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता क्षेत्रों में गिना जाता है।

मिजोरम और पूर्वोत्तर भारत में 7,500 से अधिक पुष्पीय पौधों तथा 2,000 से अधिक जीव-जंतुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं। संग्रहालय ने अधिसूचना से पहले ही 500 से अधिक जैविक नमूनों का संग्रह और संरक्षण कर अपनी वैज्ञानिक क्षमता का प्रदर्शन किया है। संग्रहालय क्षेत्र की स्थानिक (एंडेमिक) प्रजातियों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हाल ही में मिजोरम के जंगलों में खोजी गई उभयचर प्रजाति लेप्टोब्रचेला तमदिल इसका प्रमुख उदाहरण है। संग्रहालय में विभिन्न वर्गों के विशेषज्ञ वैज्ञानिक कार्यरत हैं, जो कम अध्ययन किए गए जीवों और पौधों पर शोध कर रहे हैं।

मंत्रालय के अनुसार, इस मान्यता से देश में जैविक नमूनों का संरक्षण उनके मूल क्षेत्र के निकट संभव होगा, जिससे वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण बेहतर होगा, परिवहन संबंधी चुनौतियां कम होंगी तथा मिजोरम राज्य जैव विविधता बोर्ड और अन्य क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

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