सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान रक्षा समझौते पर यमन का पलटवार, कहा- गठबंधन का जवाब देंगे


विदेश 08 August 2026
post

सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान रक्षा समझौते पर यमन का पलटवार, कहा- गठबंधन का जवाब देंगे

सना/रियाद, 08 अगस्त । सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए संयुक्त रक्षा समझौते के बाद यमन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। यमन के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि सऊदी अरब के साथ मिलकर यमन के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई या घेराबंदी में शामिल होने वाले देश को ‘हमलावर’ माना जाएगा, चाहे इसके लिए कोई भी कारण या नाम दिया जाए।

ईरान सरकार की अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क प्रेस टीवी

के मुताबिक शुक्रवार को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। तीनों देशों के मुताबिक, इसका उद्देश्य किसी भी संभावित आक्रामकता के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। समझौते के तहत किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

समझौते के बाद यमन की राजधानी सना की ओर से इसकी आलोचना की गई। यमन की सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल के अध्यक्ष महदी अल-मशात ने कहा कि नए समझौते को यमन के खिलाफ सऊदी कार्रवाई जारी रखने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि समझौते पिछली तारीख से लागू नहीं होते और यमन की ओर से ‘घेराबंदी के बदले घेराबंदी’ की नीति तब तक जारी रहेगी, जब तक उसके घोषित उद्देश्य पूरे नहीं हो जाते।

अल-मशात ने चेतावनी देते हुए कहा कि जो भी देश सऊदी अरब के साथ उसकी लंबे समय से चली आ रही सैन्य कार्रवाई और घेराबंदी में शामिल होगा, उसे यमन की नजर में हमलावर माना जाएगा।

उन्होंने सऊदी नेतृत्व से युद्ध के बजाय राजनीतिक समाधान और अच्छे पड़ोसी संबंधों की दिशा में आगे बढ़ने की अपील भी की।

यमन के विदेश मंत्रालय ने भी संयुक्त रक्षा समझौते पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे किसी भी क्षेत्रीय गठबंधन को लेकर सवाल उठेंगे, जिसका उद्देश्य फिलिस्तीनी मुद्दे के समर्थन और इजरायल के खिलाफ कार्रवाई के बजाय किसी मुस्लिम देश के खिलाफ दबाव बढ़ाना हो।

मंत्रालय ने रियाद से यमन के खिलाफ कथित सैन्य कार्रवाई और घेराबंदी समाप्त करने की अपील की। बयान में कहा गया कि आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर यमन में जवाबदेही से बचना संभव नहीं होगा।

यमनी मंत्रालय ने यह भी कहा कि कोई भी समझौता किसी पक्ष को दूसरे देश के अधिकारों का उल्लंघन करने या कथित अपराधों के लिए जवाबदेही से बचने का अधिकार नहीं देता।

यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन से जुड़े मोहम्मद अल-फराह ने भी समझौते की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चाहे कितने भी गठबंधन बनें, घेराबंदी समाप्त करने के प्रयास जारी रहेंगे।

उन्होंने तुर्की, पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों से अपील की कि वे किसी मुस्लिम देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई या घेराबंदी के लिए ‘राजनीतिक आड़’ उपलब्ध न कराएं।

यमन और सऊदी अरब के बीच तनाव की जड़ें वर्षों पुराने संघर्ष में हैं। 26 मार्च 2015 को सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों ने यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था। इस अभियान को अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों से सैन्य, राजनीतिक और लॉजिस्टिक समर्थन भी मिला था।

इस संघर्ष में हजारों लोगों की मौत हुई है और यमन में गंभीर मानवीय संकट पैदा हुआ। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन का घोषित उद्देश्य यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को फिर से सत्ता में लाना था, लेकिन यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सका।

2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से संघर्ष विराम की स्थिति बनी थी, हालांकि क्षेत्र में तनाव और सैन्य गतिविधियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं।

यमन का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय तनाव पहले से ही बना हुआ है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के नए रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को लेकर चर्चा बढ़ा दी है।

यमन की ओर से दिए गए बयानों से स्पष्ट है कि सना इस समझौते को लेकर सतर्क है और इसे अपने खिलाफ संभावित सैन्य दबाव के संदर्भ में देख रहा है। दूसरी ओर, तीनों समझौता करने वाले देशों ने इसे सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग मजबूत करने की पहल बताया है।

ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नया रक्षा समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा पर कितना प्रभाव डालता है और इसका यमन-सऊदी संबंधों पर क्या असर पड़ता है।

You might also like!




Advertisment