बिलासपुर, 19 सितंबर । बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के कुसमी क्षेत्र के हंसपुर में बॉक्साइट परिवहन को लेकर हुए विवाद और ग्रामीण रामनरेश की मौत के मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने निलंबित तत्कालीन कुसमी एसडीएम करुण डहरिया समेत तीन आरोपितों को नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की अदालत ने 17 सितंबर 2026 को तीन अलग-अलग आपराधिक अपीलों पर सुनवाई के बाद सभी को खारिज कर दिया।
मामले में थाना कोरंधा में अपराध क्रमांक 03/2026 दर्ज है। आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के अलावा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं में भी मामला दर्ज किया गया है। तीनों आरोपितों को 16 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस जांच पूरी होने के बाद आरोप पत्र न्यायालय में पेश किया जा चुका है।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय के आदेश में दर्ज अभियोजन पक्ष के अनुसार 15 फरवरी 2026 की रात करीब 9 बजे ग्राम हंसपुर के पास बॉक्साइट से लदे एक ट्रक को कुछ ग्रामीणों ने रोक लिया था। वाहन रोके जाने के बाद मौके पर विवाद हुआ और स्थिति मारपीट तक पहुंच गई।
अभियोजन का आरोप है कि इस दौरान तत्कालीन कुसमी एसडीएम करुण डहरिया समेत तीन लोगों ने कुछ ग्रामीणों के साथ मारपीट की। इस घटना में कई लोग घायल हुए थे। घायलों में रामनरेश भी शामिल था। उपचार के दौरान अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव के चलते उसकी मौत हो गई।
घटना के बाद थाना कोरंधा के तत्कालीन थाना प्रभारी अमर सिंह कोमरे की रिपोर्ट पर मामला दर्ज किया गया। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 115(2) और 3(5) के तहत अपराध दर्ज हुआ था। जांच के दौरान अन्य धाराएं भी जोड़ी गईं। इनमें धारा 109(1), 115, 296 और 238 के साथ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1)(R), 3(1)(S) और 3(2)(v) शामिल हैं।
उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक मामले में करुण डहरिया समेत तीनों आरोपितों को 16 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद आरोप पत्र न्यायालय में पेश कर दिया। ट्रायल कोर्ट में कुछ अभियोजन गवाहों के बयान भी दर्ज हो चुके हैं।
जमानत के लिए हाईकोर्ट पहुंचे आरोपितों की ओर से दलील दी गई कि वे लंबे समय से जेल में हैं और पुलिस की जांच पूरी हो चुकी है। ऐसे में उन्हें नियमित जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।
करुण डहरिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे ने अदालत में अलग घटनाक्रम प्रस्तुत किया। बचाव पक्ष के अनुसार डहरिया को हंसपुर और धनेशपुर क्षेत्र में अवैध बॉक्साइट खनन और परिवहन की जानकारी मिली थी। उन्होंने यह सूचना जिला कलेक्टर को दी थी।
बचाव पक्ष के मुताबिक कलेक्टर के निर्देश पर करुण डहरिया मौके पर पहुंचे और बॉक्साइट से लदे वाहन को जब्त किया गया। इसके बाद वाहन को पुलिस थाने ले जाने के लिए दो लोगों को कहा गया। रास्ते में कथित अवैध खनन से जुड़े राहुल जायसवाल के कुछ लोगों ने वाहन को रोक लिया, जिसके बाद विवाद और झड़प हुई।
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि करुण डहरिया ने स्थानीय नायब तहसीलदार से संपर्क कर बल के साथ मौके पर पहुंचने का अनुरोध किया था। नायब तहसीलदार के पहुंचने के बाद डहरिया भी घटनास्थल पर पहुंचे, जहां कई लोग घायल मिले। इनमें रामनरेश भी था, जिसकी बाद में उपचार के दौरान मौत हो गई।
बचाव पक्ष ने जिला कलेक्टर की ओर से कराई गई जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसमें वर्तमान आरोपितों की किसी अपराध में संलिप्तता सामने नहीं आई थी। यह भी दलील दी गई कि कुछ महत्वपूर्ण गवाहों ने बचाव पक्ष के पक्ष में बयान दिए हैं।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपितों से ऐसा कोई आपत्तिजनक सामान बरामद नहीं हुआ है, जो उन्हें अपराध से जोड़ता हो। चूंकि जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए लंबे समय से जेल में बंद आरोपितों को जमानत दी जानी चाहिए।
मामले में आपत्तिकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा और अधिवक्ता मोहम्मद नक़ीब ने जमानत याचिकाओं का विरोध किया। उनकी ओर से अदालत में कहा गया कि तीनों आरोपितों पर रामनरेश के साथ हाथ-मुक्कों से मारपीट करने का आरोप है और इसी घटना के बाद उपचार के दौरान उसकी मौत हुई।
आपत्तिकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि मृतक अनुसूचित जनजाति वर्ग से था, जिसके चलते मामले में एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी लगाई गई हैं। उनका तर्क था कि जमानत के स्तर पर बचाव पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाहों के बयानों की विस्तृत समीक्षा नहीं की जा सकती।
राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता डॉ. सौरभ कुमार पांडे ने भी जमानत का विरोध किया। राज्य पक्ष ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 180 के तहत दर्ज कई गवाहों के बयानों में अभियोजन के मामले का समर्थन किया गया है। हालांकि, इनमें से कई गवाहों की न्यायालय में अभी गवाही होना बाकी है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद उच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ घायल व्यक्तियों और पुलिसकर्मियों के बयानों में आरोपितों द्वारा रामनरेश के साथ हाथ-मुक्कों से मारपीट किए जाने की बात दर्ज है। वहीं ट्रायल कोर्ट के समक्ष कुछ गवाहों ने बचाव पक्ष के समर्थन में भी बयान दिए हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत पर सुनवाई के दौरान साक्ष्यों की विस्तृत जांच करना उचित नहीं है। गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता और उनकी अंतिम समीक्षा मुकदमे की सुनवाई के दौरान की जानी है। जमानत के स्तर पर अदालत को प्रथमदृष्टया मामले की स्थिति पर विचार करना होता है।
उच्च न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज एफआईआर में आरोपितों पर ग्रामीणों, जिसमें रामनरेश भी शामिल था, के साथ कथित गाली-गलौज और हाथ-मुक्कों से मारपीट करने के विशिष्ट आरोप दर्ज हैं।
बचाव पक्ष ने जिस जिला कलेक्टर की जांच रिपोर्ट को अपने पक्ष में आधार बनाया था, उस पर भी उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में कुछ निष्कर्ष आरोपितों के पक्ष में बताए गए हैं, लेकिन यह रिपोर्ट आरोप पत्र का हिस्सा नहीं है। इसलिए जमानत के इस चरण में उस रिपोर्ट की प्रासंगिकता पर विचार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपितों को अपनी निर्दोषता साबित करने का पूरा अवसर मिलेगा।
तीनों जमानत अपीलें खारिज
सभी तथ्यों, केस डायरी और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद उच्च न्यायालय ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में तीनों आरोपितों को नियमित जमानत पर रिहा करने का मामला नहीं बनता। इसके साथ ही करुण डहरिया समेत तीनों की ओर से दायर अलग-अलग आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया गया।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाने और सुनवाई को शीघ्र पूरा करने की स्वतंत्रता दी है। मामले में अब आगे की कार्रवाई ट्रायल कोर्ट में होगी।



















